Monday, 8 January 2018

सूचना का अधिकार



सूचना का अधिकार इक्‍कीसवीं सदी के प्रांरभ का जन साधारण का एक अमूल्‍य उपहार है। जब से संविधान के अनुच्‍छेद 21 तथा 19(1)(क) अंतर्गत क्रमश: प्राण एवं देहिक स्‍वतंत्रता तथा वाक एवं अभिव्‍यक्ति की स्‍वतत्रंता के मूल अधिकार का उद्घाेेेष किया गया है, तब से सूचना के अधिकार काे अपरिहार्य माने जाने लगा है, क्‍योंकि इस अधिकार के बिना दोनों स्‍वतंत्रताऐं अपूर्ण लगती हैं, अंतत: वर्ष 2005 में यह अधिनियम बन ही गया और 12 अक्‍टूबर 2005 मैैं यह अधिनियम लागू हो गया।


सूचना का अधिकार अधिनियम के अंंतर्गत निम्नलिखित बिन्दु आते है-

  1. कार्यो, दस्तावेजों, रिकार्डो का निरीक्षण।
  2. दस्तावेज या रिकार्डो की प्रस्तावना। सारांश, नोट्स व प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त करना।
  3. सामग्री के प्रमाणित नमूने लेना।
  4. प्रिंट आउट, डिस्क, फ्लाॅपी, टेप, वीडियो कैसेटो के रूप में या कोई अन्य इलेक्ट्रानिक रूप में जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
सूचना का अधिकार अधिनियम् 2005 के प्रमुख प्रावधानः
  • समस्त सरकारी विभाग, पब्लिक सेक्टर यूनिट, किसी भी प्रकार की सरकारी सहायता से चल रहीं गैर सरकारी संस्थाएं व शिक्षण संस्थान आदि विभाग इसमें शामिल हैं। पूर्णतः से निजी संस्थाएं इस कानून के दायरे में नहीं हैं लेकिन यदि किसी कानून के तहत कोई सरकारी विभाग किसी निजी संस्था से कोई जानकारी मांग सकता है तो उस विभाग के माध्यम से वह सूचना मांगी जा सकती है। 
  • प्रत्येक सरकारी विभाग में एक या एक से अधिक जनसूचना अधिकारी बनाए गए हैं, जो सूचना के अधिकार के तहत आवेदन स्वीकार करते हैं, मांगी गई सूचनाएं एकत्र करते हैं और उसे आवेदनकर्ता को उपलब्ध कराते हैं। 
  • जनसूचना अधिकारी की दायित्व है कि वह 30 दिन अथवा जीवन व स्वतंत्रता के मामले में 48 घण्टे के अन्दर (कुछ मामलों में 45 दिन तक) मांगी गई सूचना उपलब्ध कराए।
  • यदि जनसूचना अधिकारी आवेदन लेने से मना करता है, तय समय सीमा में सूचना नहीं उपलब्ध् कराता है अथवा गलत या भ्रामक जानकारी देता है तो देरी के लिए 250 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से 25000 तक का जुर्माना उसके वेतन में से काटा जा सकता है। साथ ही उसे सूचना भी देनी होगी। 
  • लोक सूचना अधिकारी को अधिकार नहीं है कि वह आपसे सूचना मांगने का कारण नहीं पूछ सकता। 
  • सूचना मांगने के लिए आवेदन फीस देनी होगी (केन्द्र सरकार ने आवेदन के साथ 10 रुपए की फीस तय की है। लेकिन कुछ राज्यों में यह अधिक है, बीपीएल कार्डधरकों को आवेदन शुल्क में छुट प्राप्त है। 
  • दस्तावेजों की प्रति लेने के लिए भी फीस देनी होगी। केन्द्र सरकार ने यह फीस 2 रुपए प्रति पृष्ठ रखी है लेकिन कुछ राज्यों में यह अधिक है, अगर सूचना तय समय सीमा में नहीं उपलब्ध कराई गई है तो सूचना मुफ्त दी जायेगी। 
  • यदि कोई लोक सूचना अधिकारी यह समझता है कि मांगी गई सूचना उसके विभाग से सम्बंधित नहीं है तो यह उसका कर्तव्य है कि उस आवेदन को पांच दिन के अन्दर सम्बंधित विभाग को भेजे और आवेदक को भी सूचित करे। ऐसी स्थिति में सूचना मिलने की समय सीमा 30 की जगह 35 दिन होगी। 
  • लोक सूचना अधिकारी यदि आवेदन लेने से इंकार करता है। अथवा परेशान करता है। तो उसकी शिकायत सीधे सूचना आयोग से की जा सकती है। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचनाओं को अस्वीकार करने, अपूर्ण, भ्रम में डालने वाली या गलत सूचना देने अथवा सूचना के लिए अधिक फीस मांगने के खिलाफ केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग के पास शिकायत कर सकते है। 
  • जनसूचना अधिकारी कुछ मामलों में सूचना देने से मना कर सकता है। जिन मामलों से सम्बंधित सूचना नहीं दी जा सकती उनका विवरण सूचना के अधिकार कानून की धारा 8 में दिया गया है। लेकिन यदि मांगी गई सूचना जनहित में है तो धारा 8 में मना की गई सूचना भी दी जा सकती है। जो सूचना संसद या विधानसभा को देने से मना नहीं किया जा सकता उसे किसी आम आदमी को भी देने से मना नहीं किया जा सकता। 
  • यदि लोक सूचना अधिकारी निर्धारित समय-सीमा के भीतर सूचना नहीं देते है या धारा 8 का गलत इस्तेमाल करते हुए सूचना देने से मना करता है, या दी गई सूचना से सन्तुष्ट नहीं होने की स्थिति में 30 दिनों के भीतर सम्बंधित जनसूचना अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी यानि प्रथम अपील अधिकारी के समक्ष प्रथम अपील की जा सकती है। 
  • यदि आप प्रथम अपील से भी सन्तुष्ट नहीं हैं तो दूसरी अपील 60 दिनों के भीतर केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग (जिससे सम्बंधित हो) के पास करनी होती है।
सूचना का अधिकार अधिनियम RTI के माध्‍यम से आप सरकार और किसी भी विभाग से सूचना मांग सकते है, आमतौर पर लोगो को इतना ही पता होता है। यही वजह है की अमूमन लोग एक सादे कागज पर अपने सवाल लिखकर सम्बंधित विभाग को भेज देते हैं लेकिन उसका उत्तर नहीं मिलता क्योंकि RTI सही तरीके से दाखिल नहीं रहती। आज हम आपको RTI से सम्बंधित सही तरीके से आवेदन लिखने की जानकारी दे रहे हैं ताकि आप इसका लाभ उठा सकें, सूचना के अधिकार हेतु आवेदन की प्रति प्रस्‍तुत है, इसे आप डाउनलोड करके सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत संबंधित विभाग से जानकारी प्राप्‍त कर सकते हैं, आपकी सुविधा के लिए भरा हुआ आवेदन एवं रिक्‍त आवेदन दोनों दिये गये हैं, आप क्लिक करके डाउनलोड कर सकते हैैंं।


शैलेश जैन, एडव्‍होकेट
मोबाईल नम्‍बर 09479836178


Thursday, 4 January 2018

निर्वसीयती उत्तराधिकार

सहदायिकी सम्पत्ति में के हित का न्यागमन
(1) हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ पर और से, मिताक्षरा विधि द्वारा शासित संयुक्त हिन्दू परिवार में, सहदायिक की पुत्री —
(क) जन्म से उसी ढंग में अपने अधिकार में सहदायिक होगी, जैसे पुत्र,
(ख) को सहदायिकी सम्पति में वही अधिकार होगा, जैसा उसे होता, यदि वह पुत्र होता,
(ग) उक्त सहदायिकी सम्पति के सम्बन्ध में उन्हीं दायित्वों के अध्यधीन होगी, जैसे पुत्र का दायित्व है।
और हिन्दू मिताक्षरा सहदायिक का कोई निदेश सहदायिक की पुत्री के निर्देश को शामिल करने वाला माना जायेगा; परन्तु इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई चीज सम्पति के किसी विभाजन या वसीयती विन्यास को, जो दिसम्बर, 2004 के 20वें दिन के पूर्व किया गया है, शामिल करके किसी विन्यास या अन्य संक्रमण को प्रभावित नहीं करेगी या अविधिमान्य नहीं बनायेगी।
(2) कोई सम्पति, जिसमें महिला हिन्दू उपधारा (1) के परिणामस्वरूप हकदार होती है, उसके द्वारा सहदायिकी स्वामित्व की घटना के साथ धारण की जायेगी और इस अधिनियम या तत्समय प्रवर्तित किस अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी चीज के होते हुये भी वसीयती विन्यास द्वारा उसके द्वारा व्ययन करने योग्‍य सम्पति मानी जायेगी।
(3) जहाँ हिन्दू की मृत्यु हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ के बाद होती है वहाँ मिताक्षरा विधि द्वारा शासित संयुक्त हिन्दू परिवार की सम्पत्ति में उसका हित इस अधिनियम के अधीन वसीयती या निवसीयती उत्तराधिकार द्वारा, यथास्थिति, निगमित होगा औ उत्तरजीविता के द्वारा नहीं; और सहदायिकी सम्पति विभाजित की गयी मानी जायेगी, मानों विभाजन् हुआ था और, -
(क) पुत्री को वही अंश आवंटित किया जाता है, जो पुत्र को आवंटित किया जाता है,
(ख) पूर्व मृत पुत्र या पूर्व मृत पुत्री का अंश, जिसे वे प्राप्त करते, यदि वे विभाजन के समय जीवित् रहते, ऐसे पूर्व मृत पुत्र के या ऐसे पूर्व मृत पुत्री के उत्तरजीवी सन्तान को आवंटित किय जायेगा, और
(ग) पूर्व मृत पुत्र के या पूर्व मृत पुत्री के पूर्व मृत सन्तान का अंश, जिसे ऐसी सन्तान प्राप्त करता, यदि वह विभाजन के समय जीवित रहता या रहती, पूर्व मृत पुत्र या पूर्व मृत पुत्री के, यथास्थिति, के पूर्व मृत सन्तान की सन्तान को आवंटित किया जायेगा।
स्पष्टीकरण
इस उपधारा के प्रयोजनों के लिये हिन्दू मिताक्षरा सहदायिक का हित सम्पत्तिमें वह अंश समझा जायेगा जो उसे विभाजन में मिलता, यदि उसकी अपनी मृत्यु में अव्यवहित पूर्व सम्पत्ति का विभाजन किया गया होता इस बात का विचार किये बिना कि वह विभाजन का दावा करने का हकदार था या नहीं।
(4) हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ के बाद, कोई न्यायालय पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के विरुद्ध उसके पिता, पितामह-प्रपितामह से किसी बकाया ऋण की वसूली के लिये एकमात्र हिन्दू विधि के अधीन पवित्र कर्तव्य के आधार पर किसी ऐसे ऋण का उन्मोचन करने के लिए ऐसे पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के हिन्दू विधि के अधीन पवित्र आबद्धता के आधार पर कार्यवाही करने के किसी अधिकार को मान्यता नहीं देगा; परन्तु हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ के पूर्व लिये गये किसी ऋण के मामले में इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई चीज -
(क) पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के विरुद्ध, यथास्थिति, कार्यवाही करने के लिये किसी लेनदार के अधिकार को प्रभावित नहीं करेगा, या
(ख) किसी ऐसे ऋण के सम्बन्ध में या ऋण की तुष्टि में किये गये किसी अन्य संक्रमण को प्रभावित नहीं करेगा और कोई ऐसा अधिकार या अन्य संक्रमण उसी ढंग में और उसी विस्तार तक पवित्र कर्तव्य के नियम के अधीन प्रवर्तनीय होगा, जैसे यह प्रवर्तनीय होता, मानों हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 प्रवर्तित किया गया है।
स्पष्टीकरण - खण्ड (ख) के प्रयोजनों के लिये अभिव्यक्ति 'पुत्र', 'पौत्र' या 'प्रपौत्र' को पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र को, यथास्थिति निर्दिष्ट करने वाला माना जायेगा, जिसे हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के प्रारम्भ पूर्व जन्मा था या दत्तक लिया गया था।
(5) इस धारा में अंतर्विष्ट कोई चीज उस विभाजन को लागू नहीं होगी, जो दिसम्बर, 2004 के 20वें दिन के पूर्व हुआ था।
स्पष्टीकरण
इस धारा के प्रयोजनों के लिये 'विभाजन' से रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन सम्यक् से पंजीकृत विभाजन विलेख के निष्पादन द्वारा किया गया कोई विभाजन, न्यायालय के डिक्री द्वारा किया गया विभाजन अभिप्रेत है।


शैलेश जैन, एडव्‍होकेट
मोबाईल नम्‍बर 09479836178

घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005
घरेलू हिंसा क्‍या है ?
शारीरिक दुर्व्यवहार अर्थात शारीरिक पीड़ा, अपहानि या जीवन या अंग या स्वास्थ्य को खतरा या लैगिंग दुर्व्यवहार अर्थात महिला की गरिमा का उल्लंघन, अपमान या तिरस्कार करना या अतिक्रमण करना या मौखिक और भावनात्मक दुर्व्यवहार अर्थात अपमान, उपहास, गाली देना या आर्थिक दुर्व्यवहार अर्थात आर्थिक या वित्तीय संसाधनों, जिसकी वह हकदार है, से वंचित करना,मानसिक रूप से परेशान करना ये सभी घरेलू हिंसा कहलाते हैं। इस क़ानून के तहत घरेलू हिंसा के दायरे में अनेक प्रकार की हिंसा और दुर्व्यवहार आते हैं। किसी भी घरेलू सम्बंध या नातेदारी में किसी प्रकार का व्यवहार, आचरण या बर्ताव जिससे (१) आपके स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन, या किसी अंग को कोई क्षति पहुँचती है, या (२) मानसिक या शारीरिक हानि होती है, घरेलू हिंसा है।
इसके अलावा घरेलू सम्बन्धों या नातेदारी में, किसी भी प्रकार का
  • शारीरिक दुरुपयोग (जैसे मार-पीट करना, थप्पड़ मारना, दाँत काटना, ठोकर मारना, लात मारना इत्यादि),
  • लैंगिक शोषण (जैसे बलात्कार अथवा बलपूर्वक बनाए गए शारीरिक सम्बंध, अश्लील साहित्य या सामग्री देखने के लिए मजबूर करना, अपमानित करने के दृष्टिकोण से किया गया लैंगिक व्यवहार, और बालकों के साथ लैंगिक दुर्व्यवहार),
  • मौखिक और भावनात्मक हिंसा ( जैसे अपमानित करना, गालियाँ देना, चरित्र और आचरण पर आरोप लगाना, लड़का न होने पर प्रताड़ित करना, दहेज के नाम पर प्रताड़ित करना, नौकरी न करने या छोड़ने के लिए मजबूर करना, आपको अपने मन से विवाह न करने देना या किसी व्यक्ति विशेष से विवाह के लिए मजबूर करना, आत्महत्या की धमकी देना इत्यादि),
  • आर्थिक हिंसा ( जैसे आपको या आपके बच्चे को अपनी देखभाल के लिए धन और संसाधन न देना, आपको अपना रोज़गार न करने देना, या उसमें रुकावट डालना, आपकी आय, वेतन इत्यादि आपसे ले लेना, घर से बाहर निकाल देना इत्यादि), भी घरेलू हिंसा है।
घरेलू हिंसा की कानूनी परिभाषा
“घरेलू हिंसा के विरुद्ध महिला संरक्षण अधिनियम की धारा, 2005” घरेलू हिंसा को पारिभाषित किया गया है -“प्रतिवादी का कोई बर्ताव, भूल या किसी और को काम करने के लिए नियुक्त करना, घरेलू हिंसा में माना जाएगा –
(क) क्षति पहुँचाना या जख्मी करना या पीड़ित व्यक्ति को स्वास्थ्य, जीवन, अंगों या हित को मानसिक या शारीरिक तौर से खतरे में डालना या ऐसा करने की नीयत रखना और इसमें शारीरिक, यौनिक, मौखिक और भावनात्मक और आर्थिक शोषण शामिल है; या
(ख) दहेज़ या अन्य संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की अवैध मांग को पूरा करने के लिए महिला या उसके रिश्तेदारों को मजबूर करने के लिए यातना देना, नुक्सान पहुँचाना या जोखिम में डालना ; या
(ग) पीड़ित या उसके निकट सम्बन्धियों पर उपरोक्त वाक्यांश (क) या (ख) में सम्मिलित किसी आचरण के द्वारा दी गयी धमकी का प्रभाव होना; या
(घ) पीड़ित को शारीरिक या मानसिक तौर पर घायल करना या नुक्सान पहुँचाना”   
इस प्रकार से किया गया कोई व्यव्हार या आचरण घरेलू हिंसा के दायरे में आता है या नहीं, इसका निर्णय प्रत्येक मामले के तथ्य विशेष के आधार पर किया जाता है. इस अधिनियम के तहत यह जरूरी नहीं है की पीड़ित व्यक्ति ही शिकायत दर्ज कराये. कोई भी व्यक्ति चाहे वह पीड़ित से संबंधित हो या नहीं, घरेलू हिंसा की जानकारी इस अधिनियम के तहत नियुक्त सम्बद्ध अधिकारी को दे सकता है.

घरेलू हिंसा की शिकायत कौन दर्ज करा सकता है?

यह कोई जरूरी नहीं है कि घरेलू हिंसा वास्तव में ही घट रही हो, घटना होने की आशंका के सम्बन्ध में भी जानकारी दी जा सकती है. आरोपी व्यक्ति से घरेलू संबंध में रहने वाली महिला के द्वारा अथवा उसके प्रतिनिधि द्वारा इस सम्बन्ध में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है. निम्न महिला संबंधी शिकायत कर सकते हैं:
  1. पत्नियाँ/ लिव इन पार्टनर्स
  2. बहनें
  3. माताएं
  4. बेटियां
इस प्रकार इस अधिनियम का मकसद पारिवारिक ढांचे के अन्दर रह रही सभी स्त्रियों, चाहे वह आपस में सगी संबंधी, विवाह, दत्तक या वैसे भी साथ में रह रही हों, सभी को सुरक्षा देना है.

घरेलू हादसों के रिपोर्ट

जब पीड़िता घरेलू हिंसा की शिकायत करना चाहती हो तो रिपोर्ट दर्ज की जानी चाहिए. घरेलू हिंसा के विरुध्द संरक्षण नियम, 2006 के फॉर्म 1 में रिपोर्ट का स्वरूप दिया गया है.
पीड़िता की शिकायत में उसकी व्यक्तिगत जानकारियों जैसे नाम, आयु, पता, फोन नंबर, बच्चों की जानकारी, घरेलू हिंसा की घटना का पूरा ब्यौरा, और प्रतिवादी का भी विवरण दिये जाने की जरुरत होती है. जब जरुरत हो तो संबंधी दस्तावेज जैसे चिकित्सकीय विधिक दस्तावेज, डॉक्टर के निर्देश या स्त्रीधन की सूची को रिपोर्ट के साथ संलग्‍न करना चाहिए. शिकायत में पीड़िता को मिली राहत या सहायता का भी विशेष उल्लेख किया जाना चाहिए. इस रिपोर्ट पर पीड़िता के हस्ताक्षर के साथ-साथ सुरक्षा अधिकारी के भी दस्तखत होने चाहिए. इस रिपोर्ट की प्रति स्थानीय पुलिस थाने और मजिस्ट्रेट को उचित कार्रवाई के लिए दी जानी चाहिए. एक प्रति पीड़िता और एक कॉपी सुरक्षा अधिकारी या सेवा प्रदाता के पास रहनी चाहिए.

घरेलू हिंसा अधिनियम , 2005 के तहत महिलाओं का सरंक्षण

घरेलू हिंसा की शिकार महिला को निम्नलिखित सूची में से एक या एकाधिक सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है-
धारा 18 सुरक्षा संबंधी आदेश 
धारा 19 आवास संबंधी आदेश
धारा 20 आर्थिक सहायता
धारा 21 संरक्षण अादेश
दिये जाते हैं। उपरोक्त सभी बातों के अलावा पीड़िता भारतीय दंड संहिता, 1860 धारा 498-A के तहत आरोपी के विरुद्ध आपराधिक मामलों को दर्ज को कराने का भी अधिकार देती है.

राहत पाने की प्रक्रिया

मजिस्ट्रेट :
  1. प्रतिवादी को परामर्श के लिए भेज सकता है.
  2. परिवार कल्याण में रत किसी सामाजिक कार्यकर्त्ता, विशेषकर किसी महिला को सहायता के लिए नियुक्त कर सकता है.
  3. जहाँ आवश्यक हो कार्यवाही के दौरान कैमरे के प्रयोग का आदेश दिया जा सकता है.
मजिस्ट्रेट द्वारा पीड़िता या प्रतिवाद के लिए पारित आदेश के खिलाफ, आदेश जारी होने के 30 दिनों के भीतर सत्र न्यायालय में अपील की जा सकती है.

अधिनियम के तहत कार्यरत संस्थाएं

घरेलू हिंसा के शिकार किसी भी व्यक्ति को कानूनी सहायता, मदद, आश्रय या चिकित्सकीय सहायता देना राज्य की जिम्मेदारी है. इस उद्देश्य के साथ राज्य सरकार को निम्न सस्थाओं को नियुक्त करने के लिए प्राधिकृत किया गया है जो कि पीड़िता को विधि के अंतर्गत सहायता पाने के उसके अधिकार के बारे में जानकारी के साथ सहायता पाने में मदद कर सके.


1. पुलिस अधिकारी
जब भी किसी पुलिस अधिकारी को घरेलू हिंसा की घटना की जानकारी मिलती है तो यह उसका दायित्व है कि आपराधिक दंड प्रक्रिया, 1973 के प्रावधानों के अनुसार जाँच करे. इसके अतिरिक्त, घरेलू हिंसा अधिनियम पुलिस अधिकारी को दायित्व देता है कि वह पीड़िता को
(क) नि:शुल्क विधि सेवाओं के बारे में जानकारी दे;
(ख) इस अधिनियम के तहत उसकी हानि और वेदनाओं के लिए मुआवजे और नुक्सान के एवज में आवास आदेश, सुरक्षा आदेश, संरक्षण आदेश और आर्थिक राहत जैसी सहायता मुहैय्या कराये.
(ग)  सुरक्षा अधिकारियों और सेवा प्रदाताओं की सेवाएं उपलब्ध कराये; और
(घ)  अगर जरूरी हो तो आरोपी व्यक्ति के खिलाफ धारा 498 A के तहत आपराधिक मामला दर्ज करे. (केवल पत्नी ही अपने पति या उसके परिजनों के खिलाफ धारा 498 A के तहत शिकायत कर सकती है. यह अधिकार लिव इन पार्टनर्स को उपलब्ध नहीं है.)
2. सुरक्षा अधिकारी
घरेलू हिंसा अधिनियम में सुरक्षा अधिकारी अत्यधिक महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करते हैं. ये सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों के साथ काम करते हैं. ये योग्य होते हैं और इनके पास सामाजिक क्षेत्र में काम करने का कम से कम तीन सालों का अनुभव होता है. राज्य सरकार ऐसे अधिकारियों को जो ज्यादातर महिलाएं होती हैं, हर जिले में न्यनतम तीन सालों के लिए तैनात करता है और उनके काम का संज्ञान लिया जाता हैे, सुरक्षा अधिकारी का काम पीड़िता की हर कदम पर मदद करना है. वे पीड़िता की घरेलू हिंसा की रिपोर्ट को तयशुदा ढांचे में दर्ज करवाने में मदद करते हैं. वे पीड़ित को उनके अधिकारों की जानकारी देते हैं और इस अधिनियम के तहत सहायता को उपलब्ध करवाने के लिए पीड़िता को आवेदन लिखने में सहायता करते हैं. ये अधिकारी घरेलू हिंसा के मामले के निबटारे में मजिस्ट्रेट की भी सहायता करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि मजिस्ट्रेट द्वारा पारित किये गए आदेशों का अनुपालन पीड़िता के हित में हो.
स्थिति का जायजा लेने के और घरेलू हिंसा नियम, 2005 के फॉर्म V के अनुसार सुरक्षा योजना बनाने के लिए भी सुरक्षा अधिकारियों की आवश्यकता होती है. यह सब घरेलू हिंसा की आवृत्ति को रोकने के लिए उचित उपाय की सलाह देने और उन पर अमल करने के उद्देश्य से किया जाता है.
सुरक्षा अधिकारी पीड़िता को हर मुमकिन सहायता देने के लिए बाध्य हैं जिसमें उसके चिकित्सकीय परीक्षण से लेकर, उसके आवागमन और आश्रय स्थल में आवास की व्यवस्था करना शामिल है बशर्ते कि वह अपने घर पर सुरक्षित न हो. सबसे पहले सुरक्षा अधिकारी को कानूनी सहायता सेवाओं, परामर्श, चिकित्सा सहायता, या जरूरतमंद पीड़ित के आश्रय के लिए अपने क्षेत्राधिकार में शामिल सभी सेवा प्रदाताओं की सूची तैयार करनी होती है
3. सेवा प्रदाता 
सेवा प्रदाता महिलाओं के अधिकारों और हितों की सुरक्षा के लिए राज्य सरकार द्वारा पंजीकृत स्वैच्छिक संगठन हैं. ये संगठन निरोधात्मक, सुरक्षात्मक और पुनर्वास का काम करते हैं. ये घरेलू हिंसा की शिकार औरतों की सहायता करने और उन्हें कानूनी, समाजिक, चिकित्सकीय और आर्थिक सहायता देने के लिए उत्तरदायी हैं. ये संस्थाएं निश्चित आवेदन के प्रारूप में DIR को दर्ज करा सकती हैं और उसे सीधे आवश्यक कार्रवाई के लिए सम्बद्ध और मजिस्ट्रेट और सुरक्षा अधिकारी को भेज सकती हैं. अगर पीड़िता चाहे तो ये संस्थाएं उसे चिकत्सकीय सहायता और शरणगृहों में आवास का प्रबंध कर सकती हैं.
राज्य सरकार सेवा प्रदाताओं की सूची बनाती है और उसे क्षेत्र विशेष के सुरक्षा अधिकारी के पास भेजती है ताकि वे आपसी तालमेल के साथ काम कर सकें. किसी क्षेत्र विशेष के सेवा प्रदाताओं की सूची को जानकारी और आवश्यक कार्रवाई के लिए अखबार में प्रकाशित करना होता है या राज्य सरकार की वेबसाइट पर उपलब्ध कराना होता है

परामर्शदाता
परामर्शदाता सेवा प्रदाताओं के ऐसे सदस्य हैं जो कि घरेलू हिंसा के मामलों से निबटने में योग्य एवम अनुभवी होते हैं इसलिए वे घरेलू हिंसा की पीड़िता या दोषी व्यक्ति को परामर्श सेवाएं देने में दक्ष होते हैं.  इस अधिनियम के दौरान अगर मजिस्ट्रेट को ऐसा महसूस होता है कि पीड़िता या पीड़क व्यक्ति को परामर्श की आवश्यकता है तो वह उन्हें एकल या संयुक्त रूप से सेवा प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध कराये गए परामर्शदाता के पास परामर्श सत्रों में भाग लेने का सीधे तौर पर निर्देश जारी कर सकता है. परामर्शदाता दोनों पक्षों के लिए सहज स्थान पर मुलाकात का आयोजन करता है और वह पीड़ित की शिकायत के निवारण के लिए उपाय सुझाता है और जहाँ पर पीड़ित राजी हो, वह वहाँ पर समझौते का भी प्रबंध करता है. इस प्रकार के परामर्श का उद्देश्य पीड़ित व्यक्ति के विरुद्ध घरेलू हिंसा के उन्मूलन के उपायों को खोजना और विकसित करना है,

कल्याण विशेषज्ञ
कल्याण विशेषज्ञ पारिवारिक मामलों को सुलझाने में दक्षता और विशेषज्ञता प्राप्त व्यक्ति होते हैं. इस अधिनियम के तहत आवश्यकता पड़ने पर मजिस्ट्रेट कल्याण विशेषज्ञों की सहायता ले सकते हैं. इस अधिनियम के तहत जहाँ तक संभव हो महिला विशेषज्ञों का ही चुनाव किया जाता है.

आश्रय और चिकित्सा सुविधा प्रभारी
घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 6 और 7 के अनुसार आश्रय और चिकित्सा सुविधा प्रभारी का दायित्व है कि स्वय पीड़िता या सुरक्षा अधिकारी या उसकी ओर से सेवा प्रदाता के अनुरोध के आधार पर पीड़िता को आश्रय और चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराये.

अधिवक्‍ता (वकील) की भूमिका
यदि पीड़िता चाहे तो सीधे ही अधिवक्‍ता की सहायता से माननीय न्‍यायालय के समक्ष घरेलू‍ हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत आरोपियों पर प्रकरण दर्ज कर सकती हैैै, जहां न्‍यायालय से सीधे ही पीड़िता को न्‍याय मिल  सकता है।

शैलेश जैन, एडव्‍होकेट
पटेल मार्ग, शुजालपुर मण्‍डी, जिला शाजापुर (म.प्र.)
मोबाईल नम्‍बर 09479836178

Friday, 1 September 2017

304 ख अथवा 304 (B)

(1) जहां किसी स्‍त्री की मृत्‍यु किसी दाह या किसी शारीरिक क्षति द्वारा कारित की जाती है, या उसके विवाह के सात वर्ष के भीतर सामान्‍य परिस्थितियों से अन्‍यथा हो जाती है और य‍ह दर्शित किया जाता है कि, उसके मृत्‍यु के कुछ समय पूर्व पति ने या उसके पति के किसी नातेदार ने, दहेज की किसी मांग के लिए, या उसके संबंध में, उसके साथ क्रूरता की थी, या उसे तंग किया था, वहां ऐसी मृत्‍यु को दहेज मृत्‍यु कहा जाएगा, और ऐसा पति या नातेदार उसकी मृत्‍यु कारित करने वाला समझा जाएगा।
(2) जो कोई दहेज मृत्‍यु कारित करेगा वह कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष से कम की नहीं होगी किन्‍तु आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा।

धारा 304-B को लागू करने के लिए निम्न कारकों का होना आवश्यक है:
  • महिला की मृत्यु:
महिला की मृत्यु चाहे वह आत्महत्या हो या हत्या, धारा 304-B को लागू करने की सबसे पहली शर्त है. कि महिला की मृत्‍यु हुई हो, महिला की मृत्‍यु कारित करने का प्रयास करने पर अलग प्रावधान है, जो भारतीय द‍ण्‍ड विधान की धारा 307 के अंतर्गत आते हैं।
  • असाधारण परिस्थितियों में मौत:
जलने, जिस्मानी घावों, गला घोंटने, जहरखुरानी, फांसी से होने वाली मौत सभी असाधारण मौत के उदहारण हैं. धारा 304-B को प्रत्यक्ष प्रमाण की जरुरत नहीं है. किसी लड़की के द्वारा इस आरोप के साथ कि उसके ससुरालवालों ने नाकाफी दहेज़ के कारण उसका जीना मुश्किल कर दिया था, के कारण की गयी आत्महत्या, उसकी मौत को अप्राकृतिक मौत की श्रेणी में रखती है. (देविंदर सिंह और अन्य बनाम पंजाब राज्य सरकार, 2005, Cr.L.J.4160 SC )
  • विवाह के सात वर्षों के अन्दर मृत्यु:
304-B के तहत मुकदमा चलाने के लिए विवाह के सात साल की नियत अवधि का होना जरूरी है.अगर शादी के सात साल बाद महिला की मौत होती है तो मामले को भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (ख़ुदकुशी के लिए उकसाना) के साथ भारतीय प्रमाण अधिनियम की धारा 113-A (विवाहित महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने का पूर्वानुमान) के तहत दर्ज किया जाता है. यह अवधि विवाह की तिथि से गिनी जाती है न की लड़की की विदाई वाले दिन से. डी. एस. सिसोदिया बनाम के. सी. समदरिया (2001 Cr.L.J. NOC 156 Raj)  के मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय ने कहा कि शादी की तारीख को शादी के जलसे से मानना चाहिए न की ‘मुकलावा’ के उत्सव से.
  • पति या पति के परिजनों के द्वारा महिला क्रूरता या यातना की शिकार होनी चाहिए
 क्रूरता शब्द को शारीरिक और मानसिक क्रूरता दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है और भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A के विवरणों के लिए भी प्रयुक्त होता है. इस धारा के अनुसार क्रूरता से आशय है “जानबूझकर किया गया ऐसा काम जिसे किसी महिला की आत्महत्या की संभावना या उसे जीवन, हाथ-पैरों या सेहत को चाहे शारीरिक या मानसिक तौर पर क्षति पहुँचती हो  या उसे इस तरह से यातना दी जाए कि जिसमें यातना का उद्देश्य संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की नाजायज मांगों को पूरा करने के लिए या ऐसी नाजायज मांगों को उसके या उसके रिश्तेदारों द्वारा पूरा न कर पाने की सूरत में उसे या उसके किसी जानकार को नुकसान पहुँचाने की मंशा निहित हो.”  श्रीमती शांति बनाम हरियाणा राज्य सरकार (AIR 1991 SC 1226)  के मामले में उच्चतम न्यायलय का बयान था , “धारा 304 –B में ‘क्रूरता’ के बारे में कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन ऐसे अपराधों की समान पृष्ठभूमि को देखते हुए हमें क्रूरता या प्रताड़ना को धारा 498 A के तहत प्रस्तुत दंडनीय क्रूरता के रूप में देखना चाहिए.”
  • इस प्रकार की क्रूरता या प्रताड़ना दहेज़ की मांग से संम्बंधित होनी चाहिए:
फरियादी पक्ष को यह साबित करना होगा कि, ससुराल वाले दहेज की मांग करते थे, और इसी कारण से महिला की मृत्‍यु हुई है।
दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धारा 2 के अनुसार ही परिभाषित ‘दहेज़’ शब्द को समझा जाना चाहिए. इस परिभाषा में ‘विवाह के उक्त पक्षों के सम्बन्ध में ’ महत्वपूर्ण शब्द हैं. इसका मतलब है कि “किसी को किसी समय पर संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति सुरक्षा देना या देने का आश्वासन देना विवाह के पक्षों से संबंधित होना चाहिए.” दंपत्ति में से किसी को धनराशि के भुगतान या संपत्ति देने की कई अन्य घटनाएं भी हो सकती हैं. उदाहरण के लिए अलग अलग समाजों में बच्चे के जन्म पर या दूसरे समारोह में रीति-रिवाजमूलक प्रथाएं प्रचलित हैं. इस तरह के भुगतान को ‘दहेज़’ के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता है. (सतवीर सिंह बनाम पंजाब राज्य सरकार, (2001) 8 SCC 633)
  • महिला की मौत से कुछ समय पहले ही उसके साथ इस प्रकार की क्रूरता या प्रताड़ना घटित होनी चाहिए.
भारतीय दंड संहिता की धारा 304-B और प्रमाण अधिनियम की धारा 113-B में उल्लिखित ‘मौत से कुछ समय पहले ही’ का अर्थ है कि यहाँ पर एक निश्चित और जीवंत सम्बन्ध होना चाहिए यानी की दहेज़ की मांग पर आधारित क्रूरता और सम्बन्ध हत्या के बीच में साफ़ तौर पर दिखाई देने वाला कार्य-कारण सम्बन्ध होना चाहिए. दोनों, यानी हत्या और प्रताड़ना के बीच में अधिक समयांतराल नहीं होना चाहिए.
भारतीय दंड संहिता की धारा 304-B में मौजूद शब्दों, ‘मौत से कुछ समय पहले ही’ को कोई खास समयावधि में नहीं बांधा जा सकता और न ही इसे किसी समय के पैमाने पर मापा जा सकता है कि यातना मौत से कितने समय पहले दी गयी हो. इस सम्बन्ध में किसी नियत समयावधि का संकेत करना खतरनाक हो सकता है और इसे प्रत्येक मामले की खास परिस्थितियों के अनुसार तय किया जाना चाहिए.

टिप्‍पणी-

दहेज मृत्‍यु - धारा 304 (ख) भारतीय दण्‍ड संहिता के अंतर्गत दहेज मृत्‍यु के अपराध में अभियोजन को जो एक अवयव साबित करना होता है, वह यह होता है कि, महिला को उसके पति या उसके रिश्‍तेदारों ने दहेज की मांग के संबंध में या उसके लिए क्रूरता का परिपीडन करना चाहिए। धारा 304(बी) (1) भारतीय दण्‍ड विधान के स्‍पष्‍टकरण अनुसार दहेज शब्‍द का वही अर्थ है जो दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 की धारा 2 में दिया गया है। उक्‍त परिषाभा के अनुसार दहेज होने के लिए कोई सम्‍पत्ति या मूल्‍यवान प्रतिभूति, शादी के समय, पूर्व या उसके पश्‍चात उक्‍त पक्षों की शादी के संबंध में दी जाना चाहिए या देने का अनुबंध होना चाहिए। यदि कोई आर्थिक तंगी, या घरेलू खर्च की पूर्ति के लिए या खाद खरीदने के लिए कोई राशि की मांग की जाती है तो ऐसी मांग को दहेज की मांग नहीं कहा जा सकता (अप्‍पा साहेब विरूद्ध महाराष्‍ट राज्‍य 2007(1) CCSC 689)

Saturday, 26 August 2017

अस्थायी निषेधाज्ञा या वादकालीन निषेधाज्ञा 

अक्‍सर न्यायालयों में वाद पत्र के साथ अस्थायी निषेधाज्ञा का आवेदन पत्र प्रस्तुत होता है और इस आवेदन पत्र के निराकरण में वादी पक्ष को आवश्‍यकता निषेधाज्ञा पाने की होती हैं वहीं प्रतिवादी पक्ष आवेदन पत्र के जवाब और दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए समय की प्रार्थना करते है और कई बार न्यायालय में ऐसी स्थिति निर्मित हो जाती हैं। अस्थायी व्यादेश के बारे में आदेश 39 नियम 1 एवं 2 व्‍यवहार प्रक्रिया संहिता तथा धारा 94 (सी) व्‍यवहार प्रक्रिया संहिता में तथा एकपक्षीय अस्थायी व्यादेश के संबंध में आदेश 39 नियम 3 एवं 3ए व्‍यवहार प्रक्रिया संहिता में प्रावधान है तथा आदेश 39 नियम 1 एवं 2 व्‍यवहार प्रक्रिया संहिता में स्थानीय संशोधन भी ध्यान रखने योग्य हैं।

स्थगन आदेश कैसे प्राप्त कर सकते हैं -

स्थगन आदेश का मतलब यह है कि जिस काम पर रोक लगा दी गई है स्थगन आदेश के पारित होने की तिथि से स्थिर रहेगा, और इसका मतलब यह नहीं है कि आदेश अस्तित्व से बाहर है। कार्यवाही पर पूरी तरह से या सशर्त रूप से रोक लगा दी जा सकती है। अदालत निहित शक्तियों अस्थायी रूप से किसी भी कार्रवाई पर रोक लगा सकती है।

प्रॉपर्टी पर निर्माण पर स्थगन आदेश -

अदालत आदेश दे सकती है और अस्थायी निषेधाज्ञा प्रदान कर सकती है कि अमूक सम्‍पत्ति पर न्‍यायालय के आगामी आदेश तक कोई निर्माण कार्य नहीं किया जावेगा, और सम्‍पत्ति जिस अवस्‍था में वैसी ही अवस्‍था में रहेगी, न्‍यायालय का सम्‍पूर्ण समाधान होने पर आगामी आदेश प्रदान किया जावेगा, और प्रकरण के अंतिम निराकरण तक अमूक व्‍यक्ति या उसका कोई अभिकर्ता निर्माण कार्य नहीं करेगा। अदालत इस तरह के कृत्य को नियंत्रित करने के लिए अन्य आदेश दे सकती है प्रॉपर्टी की बिक्री, हटाने या हानिकारक गतिविधि को रोकने के लिए, निपटारे तक या अगले आदेश तक स्‍टे लिया जा सकता है।

स्थगन आदेश के लिए महत्‍वपूर्ण तथ्‍य -

स्‍थगन आदेश के लिए तीन महत्‍वपूर्ण तथ्‍य माने गये हैं - (1) प्रथम दृष्‍टया प्रकरण (2) सुविधा का संतुलन (3) अपूर्णीय क्षति इन तत्‍वों को हम विस्‍तार से समझेंगे-

प्रथम दृष्‍टया प्रकरण - 

जो पक्ष स्‍थगन आदेश चाहता है उसका मामला प्रथम दृष्टि में ऐसा दिखना चाहिए कि, वास्‍तव में मामला स्‍थगन आदेश चाहने वाले के पक्ष में ही प्रबल है, और प्रथम दृष्टि में ही न्‍यायालय को ऐसा आभास हो जाना चाहिए दस्‍तावेज के आधार पर एवं प्रकरण में आई साक्ष्‍य के आधार मामला देखने में स्‍थगन चाहने वाले के पक्ष में है।

सुविधा का संतुलन - 


जो पक्ष स्‍थगन आदेश चाहता है, वास्‍तव में सुविधा का संतुलन स्‍थगन चाहने वाले के पक्ष में होना चाहिए जैसे सम्‍पत्ति स्‍थगन चाहने वाले के कब्‍जे हो, अगर खेत हो तो उसमें स्‍थगन चाहने वाले व्‍यक्ति की फसल खडी हो, या अन्‍य कोई भी स्थिति हो सकती है, जिसमें सुविधा का संतुलन स्‍थगन चाहने वाले के पक्ष में प्रमाणित होना चाहिए।

अपूर्णीय क्षति - 



जो पक्ष स्‍थगन आदेश चाहता है, उसे ऐसी आंशका होना चाहिए कि, यदि न्‍यायालय द्वारा स्‍थगन आदेश नहीं दिया गया तो स्‍थगन चाहने वाले को ऐसी क्षति होगी जिसकी पूर्ति भविष्‍य में धन के रूप में नहीं की जा सकेगी।

इन तीनों तथ्‍यों का उल्‍लेख स्‍थगन चाहने वाले पक्ष को अपने स्‍थगन आवेदन में करना आवश्‍यक है, और यह भी बताना आवश्‍यक है कि, किस प्रकार से उसका मामला प्रथम दृष्‍टया प्रबल है, किस प्रकार से सुविधा का संतुलन उसके पक्ष में है, और यदि स्‍थगन आदेश नहीं दिया गया तो स्‍थगन चाहने वाले को ऐसी क्षति होगी जिसकी पूर्ति भविष्‍य में धन के रूप में नहीं की जा सकेगी। इन सभी तथ्‍यों को प्रमाणित करने का भार भी स्‍थगन चाहने वाले के पक्ष में होता है।

IPC 307

भारतीय दण्‍ड संहिता की धारा 307 -

जो कोई किसी कार्य को ऐसे आशय या ज्ञान से और ऐसी परिस्थितियों में करेगा कि यदि वह उस कार्य द्वारा मॄत्यु कारित कर देता तो वह हत्या का दोषी होता, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा, और यदि ऐसे कार्य द्वारा किसी व्यक्ति को उपहति कारित हो जाए, तो वह अपराधी या तो 2[आजीवन कारावास] से या ऐसे दण्ड से दण्डनीय होगा, जैसा एतस्मिनपूर्व वर्णित है । 
आजीवन सिद्धदोष द्वार प्रयत्न--3[जबकि इस धारा में वर्णित अपराध करने वाला कोई व्यक्ति 1[आजीवन कारावास] के दण्डादेश के अधीन हो, तब यदि उपहति कारित हुई हो, तो वह मॄत्यु से दण्डित किया जा सकेगा।] 
दृष्टांत 
(क) य का वध करने के आशय से क उस पर ऐसी परिस्थितियों में गोली चलाता है कि यदि मॄत्यु हो जाती, तो क हत्या का दोषी होता । क इस धारा के अधीन दण्डनीय है । 
(ख) क कोमल वयस के शिशु की मॄत्यु करने के आशय से उसे एक निर्जन स्थान में अरक्षित छोड़ देता है । क ने उस धारा द्वारा परिभाषित अपराध किया है, यद्यपि परिणामस्वरूप उस शिशु की मॄत्यु नहीं होती । 
(ग) य की हत्या का आशय रखते हुए क एक बन्दूक खरीदता है और उसको भरता है । क ने अभी तक अपराध नहीं किया है । य पर क बन्दूक चलाता है । उसने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है, और यदि इस प्रकार गोली मार कर वह य को घायल कर देता है, तो वह इस धारा 4[के प्रथम पैरे] के पिछले भाग द्वारा उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय है । 
(घ) विष द्वारा य की हत्या करने का आशय रखते हुए क विष खरीदता है, और उसे उस भोजन में मिला देता है, जो क के अपने पास रहता है; क ने इस धारा में परिभाषित अपराध अभी तक नहीं किया है । क उस भेजन को य की मेंजा पर रखता है, या उसको य की मेंज पर रखने के लिए य के सेवकों को परिदत्त् करता है । क ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया है ।
   हत्‍या करने का प्रयत्‍न- अब परिवादी भोजन कर अपनी झुग्‍गी में लेटा था, तभी अभियुक्‍त ने उसे किसी अन्‍य व्‍यक्ति के माध्‍यम से बाहर बुलवाया और जैसे ही परिवादी बाहर आया अभियुक्‍त ने उसे मारने के आशय से उसके सिर पर चाकू से दो बार हमला किया, और तदद्वारा उसके सिर पर क्षतियां कारित की, जब अभियुक्‍त परिवादी के पास योजनाबद्ध रीति से आया तथा उसके सिरोवल्‍क जैसे महत्‍वपूर्ण अंग पर चाकू से वार किया और उसके सिर पर काफी गंभीर लम्‍बी क्षति कारित की, जिससे उसका जीवन खतरे में पड गया, तब यह स्‍वमेव स्‍पष्‍ट और प्रकट है कि, अपीलार्थी ने परिवादी के शिरोवल्‍क पर चाकू से वार उसको मारने के आशय से किया था, अभियुक्‍त को धारा 307 भारतीय दण्‍ड संहिता के आधीन दोषसिद्ध किया गया (प्रेमनारायण विरूद्ध म०प्र० राज्‍य 2006(3) JLJ103)
धारा 307 की व्‍याख्‍या -
भारतीय दण्‍ड संहिता’ की धारा-307 के अंतर्गत हत्या के प्रयास का अपराध गठित करने के लिये यह देखना आवश्यक है कि चोट की प्रकृति क्या थी, चोट कारित करने के लिये किस स्वरूप के हथियार का प्रयोग, कितने बल के साथ किया गया। घटना के समय प्रहारकर्ता ने अपना मनोउद्देश्य किस रूप से तथा किन शब्दों को प्रकट किया ? उसका वास्तविक उद्देश्य क्या था ? आघात के लिये आहत व्यक्ति के शरीर के किन अंगों को चुना गया ? आघात कितना प्रभावशाली था ? उक्त परिस्थितियों के आधार पर ही यह अभिनिर्धारित किया जा सकता है कि वास्तव में अभियुक्त का उद्देश्य हत्या कारित करना था अथवा नहीं, किसी व्यक्ति पर हत्या के इरादे से चोट पहुंचाने पर केस दर्ज किया जाता है। इसकी सेशन कोर्ट या इससे ऊपर की अदालत में सुनवाई होती है। यह गैर जमानती अपराध है क्या है भारतीय दंड संहिता
भारतीय दण्ड संहिता यानी Indian Penal Code, IPC भारत में यहां के किसी भी नागरिक द्वारा किये गये कुछ अपराधों की परिभाषा और दण्ड का प्रावधान करती है. लेकिन यह जम्मू एवं कश्मीर और भारत की सेना पर लागू नहीं होती है. जम्मू एवं कश्मीर में इसके स्थान पर रणबीर दंड संहिता (RPC) लागू होती है.

अंग्रेजों की देन है आईपीसी
भारतीय दण्ड संहिता यानी आईपीसी सन् 1862 में ब्रिटिश काल के दौरान लागू हुई थी. इसके बाद समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहे. विशेषकर भारत के स्वतन्त्र होने के बाद इसमें बड़ा बदलाव किया गया. पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी भारतीय दण्ड संहिता को ही अपनाया. लगभग इसी रूप में यह विधान तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता के अधीन आने वाले बर्मा, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनेई आदि में भी लागू कर दिया गया था.

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भारत एक ऐसा देश है, जिसकी 80 प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है, इस आधुनिक युग में भी ग्रामीण जन बहुत ही पिछडे हुए हैं, भारत में कब कौन सा विधेयक पास हो गया, कब कोई कानून बना दिया गया है, इसके बेखबर ग्रामीण जन अपना जीवन यापन कर रहे हैं, उन्‍हें भारत के किसी कानून की कोई जानकारी नहीं है, यहां तक शहरी लोगों को भी कानून से संबंधित जानकारी नहीं होने से उन्‍हें परेशान होना पडता है, हमारा उद्देश्‍य है कि, उन्‍हें कानून से संबंधित जानकारी मिल सके, और वे किसी धोखाधडी का शिकार न हों, कानूनी जानकारी देने के लिए इस बेवसाईट का निर्माण किया गया है, अधिकतर लोग कानून को आसानी से समझ सके इसलिए हिन्‍दी में ही सम्‍पूर्ण जानकारी देने का मेरा प्रयास है। आप सभी के सहयोग एवं सलाह से इस बेवसाईट को बेहतर बनाया जा सकता है। 

शैलेश जैन, एडव्‍होकेट
पटेल मार्ग, शुजालपुर मण्‍डी, 
जिला शाजापुर (म०प्र०)
मोबाईल नम्‍बर 09479836178

Friday, 25 August 2017

Article 370 Constitution of India

भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद 370 के बारे में-

370. जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य के संबंध में अस्‍थाई उपबंध- 

(1) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, 
(क) अनुच्‍छेद 238 (सन 1956 में हटा दिया गया है) के उपबंध जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य के संबंध में लागू नहीं होगें।
(ख) जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य के लिए विधि बनाने की संसद की शक्ति-
(i) संघ सूची और समवर्ती सूची के उन विषयों तक सीमित होगी, जिनको राष्‍ट्रपति, उस राज्‍य की सरकार से परामर्श करके, उन विषयों के तत्‍स्‍थानी विषय घोषित कर दे, जो भारत डोमिनियम (अधिराज्‍य) में उस राज्‍य के अधिमिलन को शासित करने वाले अधिमिलन पत्र में ऐसे विषयों के रूप में विनिर्दिष्‍ट हैं, जिसके संबंध में डोमिनियम विधान मण्‍डल उस राज्‍य के लिए विधि बना सकता है, और
-ii) उक्‍त विषयों के उन अन्‍य विषयों तक सीमित होगी, जो राष्‍ट्रपति उस राज्‍य की सरकार की सहमति से, आदेश द्वारा, विनिर्दिष्‍ट करे।
स्पष्‍टीकरण- इस अनुच्‍छेद के प्रयोजनों के लिए, उस राज्‍य की सरकार से वह व्‍यक्ति अभिप्रेत है, जिसे राष्‍ट्रपति से, जम्‍मू कश्‍मीर के महाराजा की 5 मार्च 1948 की उदघोषणा के अधीन तत्‍समय पदस्‍थ मंत्री परिषद की सलाह पर कार्य करने वाले जम्‍मू कश्‍मीर के महाराजा के रूप में तत्‍समय मान्‍यता प्राप्‍त थी।
(ग) अनुच्‍छेद (1) और इस अनुच्‍छेद के उपबंध उस राज्‍य के संबंध में लागू होंगे।
(घ) इस संविधान के ऐसे अन्‍य उपबंध ऐसे अपवादों और उपांतरणों के अधीन रहते हुए, जो राष्‍ट्रपति आदेश द्वारा विनिर्दिष्‍ट करे, उस राज्‍य के संबंध में लागू होंगे।

परन्‍तु ऐसा कोई आदेश जो उपखण्‍ड (ख) के पैरा (i) में निर्दिष्‍ट राज्‍य के अधिमिलन पत्र में विनिर्दिष्‍ट विषयों से संबंधित है, उस राज्‍य की सरकार से परामर्श करके ही किया जाएगा, अन्‍यथा नहीं।
परन्‍तु यह और कि ऐसा कोई आदेश जो अंतिम पूर्ववर्ती परंतुक में निर्दिष्‍ट विषयों से भिन्‍न विषयों से संबंधित है, उस सरकार की सहमति से ही किया जाएगा, अन्‍यथा नहीं।
(2)  यदि खण्‍ड (1) के उपखण्‍ड (ख) के पैरा (ii) में या उस खण्‍ड के उपखण्‍ड (घ) के दूसरे परंतुक में निर्दिष्‍ट उस राज्‍य की सरकार की सहमति, उस राज्‍य का संविधान बनाने के प्रयोजन के लिए संविधान सभा के बुलाये जाने से पहले दी जाए तो उसे ऐसा संविधान सभा के समक्ष ऐसे विनिश्‍चय के लिए रखा जाएगा जो वह उस पर करे।
(3) इस अनुच्‍छेद के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, राष्‍ट्रपति लोक अधिसूचना द्वारा घोषणा कर सकेगा, कि यह अनुच्‍छेद प्रवर्तना में नहीं रहेगा या ऐसे अपवादों और उपांतरणों सहित ही और ऐसी तारीख से, प्रवर्तन में रहेगा, जो वह विनिर्दिष्‍ट करे।
 परन्‍तु राष्‍ट्रपति द्वारा ऐसी अधिसूचना निकाले जाने से पहले खण्‍ड (2) में निर्दिष्‍ट उस राज्‍य की संविधान सभा की सिफारिश आवश्‍यक होगी।


धारा ३७० के तहत जो प्रावधान है उनमें समय समय पर परिवर्तन किया गया है जिनका आरम्भ १९५४ से हुआ। १९५४ का महत्‍व इस लिये है कि १९५३ में उस समय के कश्मीर के वजीर-ए-आजम शेख महम्मद अब्दुल्ला, जो जवाहरलाल नेहरू के अंतरंग मित्र थे, को गिरफ्तार कर बंदी बनाया था। ये सारे संशोधन जम्मू-कश्मीर के विधानसभा द्वारा पारित किये गये हैं।
संशोधित किये हुये प्रावधान इस प्रकार के हैं-
  • (अ) १९५४ में चुंगी, केंद्रीय अबकारी, नागरी उड्डयन और डाकतार विभागों के कानून और नियम जम्मू-कश्मीर को लागू किये गये।
  • (आ) १९५८ से केन्द्रीय सेवा के आई ए एस तथा आय पी एस अधिकारियों की नियुक्तियाँ इस राज्य में होने लगीं। इसी के साथ सी ए जी (CAG) के अधिकार भी इस राज्य पर लागू हुए।
  • (इ) १९५९ में भारतीय जनगणना का कानून जम्मू-कश्मीर पर लागू हुआ।
  • (र्ई) १९६० में सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध अपीलों को स्वीकार करना शुरू किया, उसे अधिकृत किया गया।
  • (उ) १९६४ में संविधान के अनुच्छेद ३५६ तथा ३५७ इस राज्य पर लागू किये गये। इस अनुच्छेदों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में संवैधानिक व्यवस्था के गड़बड़ा जाने पर राष्ट्रपति का शासन लागू करने के अधिकार प्राप्त हुए।
  • (ऊ) १९६५ से श्रमिक कल्याण, श्रमिक संगठन, सामाजिक सुरक्षा तथा सामाजिक बीमा सम्बन्धी केन्द्रीय कानून राज्य पर लागू हुए।
  • (ए) १९६६ में लोकसभा में प्रत्यक्ष मतदान द्वारा निर्वाचित अपना प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया।
  • (ऐ) १९६६ में ही जम्मू-कश्मीर की विधानसभा ने अपने संविधान में आवश्यक सुधार करते हुए- ‘प्रधानमन्त्री’ के स्थान पर ‘मुख्यमन्त्री’ तथा ‘सदर-ए-रियासत’ के स्थान पर ‘राज्यपाल’ इन पदनामों को स्वीकृत कर उन नामों का प्रयोग करने की स्वीकृति दी। ‘सदर-ए-रियासत’ का चुनाव विधानसभा द्वारा हुआ करता था, अब राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होने लगी।
  • (ओ) १९६८ में जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय ने चुनाव सम्बन्धी मामलों पर अपील सुनने का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को दिया।
  • (औ) १९७१ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद २२६ के तहत विशिष्ट प्रकार के मामलों की सुनवाई करने का अधिकार उच्च न्यायालय को दिया गया।
  • (अं) १९८६ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद २४९ के प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू हुए।
  • (अः) इस धारा में ही उसके सम्पूर्ण समाप्ति की व्यवस्था बताई गयी है। धारा ३७० का उप अनुच्छेद ३ बताता है कि ‘‘पूर्ववर्ती प्रावधानों में कुछ भी लिखा हो, राष्ट्रपति प्रकट सूचना द्वारा यह घोषित कर सकते है कि यह धारा कुछ अपवादों या संशोधनों को छोड दिया जाये तो समाप्त की जा सकती है।
इस धारा का एक परन्तुक (Proviso) भी है। वह कहता है कि इसके लिये राज्य की संविधान सभा की मान्यता चाहिये। किन्तु अब राज्य की संविधान सभा ही अस्तित्व में नहीं है। जो व्यवस्था अस्तित्व में नहीं है वह कारगर कैसे हो सकती है?
जवाहरलाल नेहरू द्वारा जम्मू-कश्मीर के एक नेता पं॰ प्रेमनाथ बजाज को २१ अगस्त १९६२ में लिखे हुये पत्र से यह स्पष्ट होता है कि उनकी कल्पना में भी यही था कि कभी न कभी धारा ३७० समाप्त होगी। पं॰ नेहरू ने अपने पत्र में लिखा है-
‘‘वास्तविकता तो यह है कि संविधान का यह अनुच्छेद, जो जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा दिलाने के लिये कारणीभूत बताया जाता है, उसके होते हुये भी कई अन्य बातें की गयी हैं और जो कुछ और किया जाना है, वह भी किया जायेगा। मुख्य सवाल तो भावना का है, उसमें दूसरी और कोई बात नहीं है। कभी-कभी भावना ही बडी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है।’’

जम्‍मू-कश्‍मीर को प्राप्‍त विशेष अधिकारों की सूची

1. जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है।
2. जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रध्वज अलग होता है।
3. जम्मू - कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है जबकि भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
4. जम्मू-कश्मीर के अन्दर भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं होता है।
5. भारत के उच्चतम न्यायालय के आदेश जम्मू-कश्मीर के अन्दर मान्य नहीं होते हैं।
6. भारत की संसद को जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में अत्यन्त सीमित क्षेत्र में कानून बना सकती है।
7. जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से विवाह कर ले तो उस महिला की नागरिकता समाप्त हो जायेगी। इसके विपरीत यदि वह पकिस्तान के किसी व्यक्ति से विवाह कर ले तो उसे भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जायेगी।
8. धारा 370 की वजह से कश्मीर में भारत के वे कानून लागू नहीं होते जो भारत सरकार से पास होने के बाद भी कश्‍मीर की सरकार द्वारा पास नहीं कर दिये जाऐं, और यहीं कारण है कि, जम्‍मू कश्‍मीर में RTI लागू नहीं है, RTE लागू नहीं है, CAG लागू नहीं है।
9. कश्मीर में महिलाओं पर शरियत कानून लागू है।
10. कश्मीर में पंचायत के अधिकार नहीं।
11. कश्मीर में चपरासी को 2500 रूपये ही मिलते है।
12. कश्मीर में अल्पसंख्यकों [हिन्दू-सिख] को 16% आरक्षण नहीं मिलता।
13. धारा 370 की वजह से कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते हैं।
14. धारा 370 की वजह से ही कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी भारतीय नागरिकता मिल जाती है।

2011 की जनगणना अनुसार जम्मू शहर में 81.19% अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म बहुसंख्यक धर्म है। जम्मू शहर में सिख धर्म का दूसरा सबसे लोकप्रिय धर्म 8.83% है। जम्मू शहर में, इस्लाम के बाद 7.95%, जैन धर्म 0.33%, क्रिरिअति 8.83% और बौद्ध धर्म 8.83% है। लगभग 0.02% ने 'अन्य धर्म' कहा, लगभग 0.28% ने 'कोई विशेष धर्म' कहा।
DescriptionTotalप्रतिशत
हिन्दू467,79581.19 %
सिख50,8708.83 %
मुसलमान45,8157.95 %
ईसाई7,8001.35 %
जैन1,9100.33 %
कोई नहीं1,6110.28 %
बुद्ध2730.05 %
अन्य1240.02 %
 देश का प्रत्‍येक नागरिक चाहता है कि, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के कार्यकाल में धारा 370 पूरी तरह से समाप्‍त कर दी जावे, एवं कश्‍मीर को भारत के अन्‍य राज्‍यों की तरह दर्जा दिया जावे, भारत एक संविधान, एक कानून, और एक ही परचम की नीचे उत्‍तरोत्‍तर उन्‍नति करे, और तब ही सही मायने में कहा जा सकेगा कि, काश्‍मीर से कन्‍याकुमारी तक पूरा भारत एक है।

शैलेश जैन, एडव्‍होकेट
पटेल मार्ग, शुजालपुर मण्‍डी, जिला शाजापुर (म.प्र.)
मोबाईल नम्‍बर 09479836178